Sunday, 24 August 2025
जीवन का ध्येय
Sunday, 25 May 2025
बालक का प्रश्न
हँस कर पूछा बालक ने, माँ!
कौन तुम्हें है सबसे प्यारा
पापा, भैया, दीदी या फिरकोई नन्हा राजदुलारा !
मुस्काई माँ प्रश्न कठिन सुन
एक नज़र देखा बालक को
छोटा सा था कल तक तो ये
देखो अब इसके नाटक को!
मनोविनोद की ये तरकीब
छुटकू ने जाने कब सीखी
कल तक घुटनों चलने वाले
को, आज अचानक क्या सूझी
लगा टकटकी बालक अब तक
अपनी माँ को देख रहा था
चेहरे के उन सब भावों को
आते जाते देख रहा था
फिर मौन तोड़ कर माँ बोली
हर रिश्ता न्यारा होता है
जग में जो अपना होता है
वो सब से प्यारा होता है
जैसे तुझको प्यारे हैं सब
गुड्डे गुड़िया खेल खिलौने
वैसे ही मुझको प्यारे हैं
मेरे सारे रिश्ते अपने
बाँधा सबको इक डोरी से
कैसे उसको तोड़ सकूँगी
किसी एक के लिए किसी को
इक पल ना मैं छोड़ सकूँगी
फिर भी तू सबसे छोटा है
मेरी आँखों का तारा है
पापा, भैया, दीदी प्यारे
पर तू तो सबसे प्यारा है!
Saturday, 15 March 2025
क़लम ख़ामोश है
मुद्दआ = आशय, उद्देश्य, अभिप्राय, मंशा, स्वार्थ, प्रयोजन, दिल की इच्छा; वो चीज़ जिस पर दावा हो, जाएदाद; तात्पर्य, मतलब, अर्थ
मेहर = कृपा, दया, करुणा; स्नेह, प्रेम
यदा-कदा = जब तब, कभी कभी
हंगाम = वक़्त, ज़माना, मौसम; अफ़रातफ़री, हलचल, मजमा, भीड़
दहर = संसार, दुनिया
गिराँ = महंगा, अनमोल; कठिन; भारी, वज्नी; अरुचिकर, नापसंद, अप्रिय
ज़ेहन = मन, विचार की क्षमता, समझ, धारणाशक्ति; समझने-बूझने की शक्ति; याददाश्त
मुकम्मल = पूर्ण, पूरा; जिसमें ख़राबी न हो; शुद्ध; बिना घटाए बढ़ाए
जुस्तुजू = खोज, ढूंढ़ना, तलाश; खोई हुई वस्तु की तलाश करना, किसी चीज़ को प्राप्त करने के लिए किया गया प्रयास, आकांक्षा, इच्छा, जिज्ञासा
बे-लौस = निःस्वार्थ;
निष्पक्ष, तटस्थ; बेदाग़
चराग़ाँ = चराग़ों का जलना, पंक्तियों में बहुत से दीपक जलाने का कर्म; जलते हुए चराग़ों की पंक्तियाँ, दीपावली, दीपमाला, दीपोत्सव; बहुत से दीपक
रहगुज़र = रास्ता, पथ, मार्ग
चराग़ = दीप, दीपक, दिया,
लैम्प; रौनक़, बनाव-सिंगार, रौशनी, उजाला
Sunday, 1 December 2024
अलविदा
बर्दाश्त कर लिया हमने किसी तरह उसे खो देना
बर्दाश्त होता
नहीं मगर किसी तरह उसका न होना
वो गया भी तो कुछ
इस तरह बिना पैग़ाम दफ़अतन1
ढूँढता रह गया मैं नाकाम किये न जाने कितने जतन
लोग हमदर्द न
जाने कितने दिलासे दे चुके अब तक
और न जाने चलेगा ये
तकल्लुफ़ी सिलसिला कब तक
मैं आज जो कुछ भी हूँ बस उसी की बदौलत हूँ
लोग कहते भी हैं कि मैं कुछ-कुछ उसी की सूरत हूँ
कोरी तसल्ली है कि
जब तक का साथ था ख़ुशनुमा था
किसी को क्या ख़बर कि वो शख्स़ मेरा क़ुत्बनुमा2
था
खो गया वक़्त की गर्दिशों में वो मेरे अज्दाद3
की तरह
रह गया ज़ेहन में मेरे ख़ुशफ़हम सी इक याद की तरह
1.दफ़अतन = अचानक, सहसा, यकायक, अकस्मात; फौरन ; बिना सोचे-समझे
2.क़ुत्बनुमा = दिशा बतानेवाला यंत्र, compass; (लाक्षणिक) नेतृत्व करने वाला, मार्गदर्शक, पथप्रदर्शक
3.अज्दाद = पूर्वज, पुरखे, बाप दादा, पुराने लोग
Sunday, 26 May 2024
वक़्त-ए-फुर्क़त
1.
बदस्तूर = दस्तूर के अनुसार; यथावत
2.
मुसलसल = निरंतर, लगातार, सतत
3.
मजाज़ी = सांसारिक
4.
मस’अले = समस्याएँ
5.
रूहानी = रूह या आत्मा से सम्बंधित; दिली
6.
बेतरतीब = जो तरतीब में न हो; क्रमहीन; अनियमित; अस्त-व्यस्त
7.
वक़्त-ए-फुर्क़त = जुदाई का समय
8.
अर्सा = समय; अंतराल
9.
क़तरा = बूँद
10. दर्या = नदी
Sunday, 18 February 2024
अनबुझ सवाल
Thursday, 11 January 2024
मुकम्मल ज़िन्दगी
आख़िर क्या होती है
एक मुकम्मल1
ज़िन्दगी ?
ये अजीब सा सवाल,
पता नहीं कहाँ से
आ कर
ज़ेहन2
में एक बोझ
की तरह बैठ गया है.
उठते-बैठते हमेशा
ज़ेहन में इस पर
एक
तक़रीर3
सी चलती रहती है.
कहीं ये वो
ज़िन्दगी तो नहीं
जिसने बेशुमार4 दौलत कमाई हो,
ढेरों कामयाबियाँ हासिल की हों,
ता-उम्र सेहतमन्द रही हो,
और साथ ही दुख-दर्द से भी
बिलकुल नावाक़िफ़5 रही हो.
अब ज़ाहिर है कि ऐसी ज़िन्दगी तो
ख़्वाबों-ख़यालों में ही मिलेगी,
हक़ीक़तन6 तो ये मुमकिन नहीं लगती.
तो फिर एक मुकम्मल ज़िन्दगी
कहीं वो ज़िन्दगी
तो नहीं
जिसे जीने वाला
अपने आख़िरी
लम्हों से थोड़ा पहले
चंद जानने वालों
के दरमियान
ये ऐलान कर दे,
कि उसने एक
मुकम्मल ज़िन्दगी जी है
और उसे अपनी
ज़िन्दगी से
कोई भी गिला नहीं
है.
और तो और,
अगर मौका मिले तो
ये क़िबला7 वही ज़िन्दगी
बिला शिक्वा8,
दोबारा जीने को
भी तैयार हैं!
मगर क्या हम उनके
क़ौल9 को
आँखें मूँद के सच
मान सकते हैं!
अगर नहीं, तो क्या फिर
कोई ज़िन्दगी
मुकम्मल नहीं,
और क्या, ये
सिर्फ़
तसव्वुर बाँधने10 की बात है!
फ़ौरी11 तौर पर देखें
तो यही सच मालूम होता
है,
क्योंकि बड़ी-बड़ी
शख्सियतों तक ने भी
अपनी ज़िन्दगी में
कुछ न कुछ
मलाल होने की बात
क़ुबूल की है,
और बहुतों ने ये
माना भी है
कि उनकी ज़िन्दगी मुकम्मल
नहीं रही.
तो फिर ये कामयाबी,
ये दौलत, ये शोहरत,
अगर ये सब ज़िन्दगी को
मुकम्मल नहीं बना सकते
तो फिर आख़िर क्या है वो चीज़
जो इस ज़िन्दगी को
मुकम्मल बनाती है!
उस दरवेश12 ने मुस्कुराते हुए
मुझसे बस इतना ही कहा, कि
तुम्हारा ये सवाल ही ग़लत है!
ऐसी कोई चीज़ नहीं जो तुम्हारी
ज़िन्दगी को मुकम्मल बना सके,
चीज़ों की इतनी हैसियत कहाँ!
ज़िन्दगी का मुकम्मल होना,
किसी चीज़ या मुकाम के हासिल होने
या फिर किसी दर्द या तकलीफ़ के
बस ना होने से ही नहीं होता,
और ना ही ज़िन्दगी,
अपने आख़िर में जा कर
मुकम्मल होती है.
एक नया मौका पाती है
मुकम्मल होने का.
वो दिन, वो लम्हे, जो तुम्हें
सुकून और इत्मीनान पहुँचाते हैं,
जिनका गुज़रना,
तुम्हें मालूम तक नहीं पड़ता,
और जिन्हें तुम नहीं गुज़ार रहे होते
किसी चीज़ की ख़ातिर,
या किसी और की ख़ातिर.
तुम्हें मालूम होता है
कि उस लम्हे में ज़िन्दगी
मुकम्मल गुज़री या नहीं !
एक दिन जब तुम बहुत बीमार थे, फिर भी
तुमने किसी ज़रूरतमंद की मदद की थी
वो दिन, तुम्हारी जिस्मानी तकलीफ़ के बावजूद भी
तुम्हें मालूम है कि मुकम्मल गुज़रा
दौलतमंद होने के बाद भी, जब-जब
तुमने अपनी ज़िन्दगी में कोई कमी
महसूस नहीं की, वो वक़्त,
तुम्हें मालूम है कि मुकम्मल गुज़रा
ऊँचे ओहदों पर पहुँच कर भी
जब कभी तुमने ख़ुद को
अपने साथियों से दूर नहीं पाया, वो हर लम्हा,
तुम्हें मालूम है कि मुकम्मल गुज़रा
तुम्हारी किसी कामयाबी का जश्न
जब कभी भी तुम्हें अकेले
नहीं मनाना पड़ा, वो दिन,
तुम्हें मालूम है कि मुकम्मल गुज़रा
और इस तरह मेरे दोस्त
तुम ख़ुद देख सकते हो
कि कब, कहाँ और कैसे
तुम्हारी ज़िन्दगी मुकम्मल नहीं हो पाई !
वैसे याद रहे कि हर एक ज़िन्दगी
एक किस्से की तरह
होती है
और कोई भी किस्सा
चाहे वो मुख़्तसर13 हो या तवील14,
ख़ुशनुमा हो या ग़मगीन,
मुकम्मल हो सकता
है.
और रहा सवाल कि
आख़िर क्या है
एक मुकम्मल ज़िन्दगी !
तो बस यूँ समझ लो
कि एक सिलसिला है
मुकम्मल लम्हों और दिनों का,
एक ठहराव है आदमी की सोच में,
एक नज़रिया है ज़िन्दगी के बारे में,
कि फिर जिसके बाद
ज़िन्दगी मुहताज15 नहीं रहती
किसी ओहदे की, किसी मुकाम की,
किसी दौलत या शोहरत की,
और ना ही किसी कल की.
वो आज, इस लम्हे में ही
पूरी तरह मुकम्मल है,
और ऐसा होने से उसे
कोई नाकामयाबी,
कोई महरूमी16,
नहीं रोक सकती.
अगर तुम पैदा कर
सको
ख़ुद में वो सोच,
वो ठहराव, वो
नज़रिया,
तो मेरे दोस्त, हर
रोज़
तुम अपने सामने
खड़ा पाओगे
इक मुकम्मल
ज़िन्दगी को.
1. मुकम्मल = संपूर्ण, भरपूर.
2. ज़ेहन = मन, बुद्धि.
3. तक़रीर = वक्तव्य, बात, बातचीत
4. बेशुमार = असंख्य, अनगिनत, जिनकी गिनती न हो सके, बहुत अधिक
5. नावाक़िफ़ = अनभिज्ञ, अपरिचित
6. हक़ीक़तन = वास्तव में; वस्तुतः; सच में; हकीकत में
7. क़िबला = बुज़ुर्ग या अज़ीज़ शख़्स के लिए,
प्रतिष्ठित और सम्मानित व्यक्तियों के लिए संबोधन
का शब्द
8. बिला शिक्वा = बिना शिकायत
9. क़ौल = कथन, वचन, बात; प्रतिज्ञा, वादा
10. तसव्वुर बाँधना = ख़्याल करना, सोचना, कल्पना करना
11. फ़ौरी = जल्दी
12. दरवेश = साधु; संन्यासी; फ़कीर; भिक्षुक
13. मुख़्तसर = लघु, कम, थोड़ा,
संक्षिप्त, घटाया या छोटा किया हुआ, छोटा
14. तवील = दीर्घ, लंबा
15. मुहताज = दरिद्र, ज़रूरतमंद, इच्छुक, निर्धन, आश्रित, ज़रूरतमंद, अभाव वाला, जिस के पास कुछ न हो
16. महरूमी = निराशा, असफलता, नाकामी, वंचित रहना, अभाव
1.

