Sunday, 24 August 2025

जीवन का ध्येय



जीवन का  इक ध्येय कठिन चुन 
क्या   रखा   इस  आसानी  में
ऊँचे  लक्ष्य  बिना   ये  जीवन 
समझो   गुज़रा   नादानी   में

स्वप्न  अगर हो इन  आँखों  में
नामुमकिन  हो  तो  बेहतर   है
मार्ग  दुरुह  जितना  ही   होगा
फिर  मंज़िल  उतनी  सुन्दर  है

कठिन अग्नि  में तप कर ही तो
सोना   कुन्दन  बन  पाता   है
अथक परिश्रम के  बिन  ये तन
रोगी   जैसा   बन   जाता   है

जीवन  रण  है  पल  प्रति  पल
सामर्थ्य    बढ़ेगा    लड़ने   से 
जब  ठान लिया  तो  ठान लिया 
फिर  क्या मतलब  है  डरने  से 

खेत  रहे  जो   बड़े   युद्ध  में
जो   वीरगति   को   प्राप्त  हुए
फैली   कीर्ति  दिग्  दिगंत  तक 
वो   जनमानस  में  व्याप्त  हुए

योग्य   बनो  तुम  इस  लायक   
स्वरूप  बदल  दो   दुनिया  का
सौभाग्य  लिखो तुम  ख़ुद अपना 
प्रारब्ध  बदल  दो   दुनिया  का 










Sunday, 25 May 2025

बालक का प्रश्न

हँस कर पूछा बालक ने, माँ!

कौन  तुम्हें  है सबसे  प्यारा 

पापा, भैया, दीदी  या  फिर 

कोई    नन्हा   राजदुलारा !


मुस्काई  माँ  प्रश्न कठिन सुन

एक नज़र देखा  बालक को

छोटा सा था कल तक तो ये 

देखो अब इसके नाटक को!


मनोविनोद  की  ये  तरकीब 

छुटकू  ने  जाने  कब  सीखी

कल तक घुटनों चलने वाले 

को, आज अचानक क्या सूझी 


लगा टकटकी बालक अब तक

अपनी   माँ  को  देख  रहा  था 

चेहरे  के  उन  सब  भावों  को 

आते   जाते   देख    रहा    था 


फिर मौन  तोड़ कर  माँ बोली

हर   रिश्ता   न्यारा    होता  है 

जग  में  जो   अपना  होता  है 

वो   सब  से  प्यारा  होता   है 


जैसे  तुझको  प्यारे  हैं  सब 

गुड्डे   गुड़िया  खेल  खिलौने 

वैसे  ही   मुझको  प्यारे  हैं

मेरे   सारे    रिश्ते    अपने 


बाँधा  सबको   इक  डोरी  से 

कैसे   उसको   तोड़  सकूँगी

किसी एक के लिए किसी को 

इक  पल ना  मैं  छोड़ सकूँगी


फिर  भी  तू  सबसे  छोटा है 

मेरी   आँखों   का  तारा   है 

पापा,   भैया,   दीदी   प्यारे 

पर  तू  तो  सबसे प्यारा है!


 

Saturday, 15 March 2025

क़लम ख़ामोश है


क़लम  ख़ामोश है  बहुत  दिनों  से  कुछ लिखा  नहीं 
तुम्हारे   बाद   मुद्दआ   भी    कुछ   ऐसा   रहा   नहीं 

ये    कैसी    मेहर  वक़्त   की  तुम्हें   हम  भूलने  लगे 
सताए    याद   ना   यदा-कदा    यूँ   भी   हुआ   नहीं 

वही    इंसान  हर   तरफ़    वही   हंगाम   हर   तरफ़ 
तुम्हारे   बिन  लगे  है   यूँ  कहीं   कुछ  भी  नया नहीं 

मिले    कितने   ही   लोग   ख़ूबसूरत   राह   में  मगर 
तुम्हारे   बाद   दहर   में   कोई   तुम  सा  दिखा  नहीं 

गिराँ    हैं   ज़ेहन    पर    मेरे   अधूरे  क़र्ज़  की  तरह 
तुम्हारी  ख़्वाहिशें  जिन्हें   मुकम्मल  कर  सका  नहीं 

निगाहों   में   न   जुस्तुजू    रही    ना    इन्तिज़ार   ही 
हुआ बस यूँ कि दिल समझ गया अब कुछ बचा नहीं

शजर   बे-वक़्त   गिर  गया   मुझे   यूँ   बे-पनाह  कर 
किसी  बे-लौस  इश्क़  का  सहारा  फिर  मिला  नहीं  

उसी   की   रौशनी   से   थी   चराग़ाँ   रहगुज़र   मेरी 
गया  है   बुझ   चराग़   पर   अँधेरा   क्यूँ   हुआ  नहीं 





मुद्दआ = आशय, उद्देश्य, अभिप्राय, मंशा, स्वार्थ, प्रयोजन, दिल की इच्छा; वो चीज़ जिस पर दावा हो, जाएदाद; तात्पर्य, मतलब, अर्थ

मेहर = कृपा, दया, करुणा; स्नेह, प्रेम

यदा-कदा = जब तब, कभी कभी

हंगाम = वक़्त, ज़माना, मौसम; अफ़रातफ़री, हलचल, मजमा, भीड़

दहर = संसार, दुनिया

गिराँ = महंगा, अनमोल; कठिन; भारी, वज्नी; अरुचिकर, नापसंद, अप्रिय

ज़ेहन = मन, विचार की क्षमता, समझ, धारणाशक्ति; समझने-बूझने की शक्ति; याददाश्त

मुकम्मल = पूर्ण, पूरा; जिसमें ख़राबी न हो; शुद्ध; बिना घटाए बढ़ाए

जुस्तुजू = खोज, ढूंढ़ना, तलाश; खोई हुई वस्तु की तलाश करना, किसी चीज़ को प्राप्त करने के लिए किया गया प्रयास, आकांक्षा, इच्छा, जिज्ञासा

शजर = पेड़, वृक्ष

बे-लौस = निःस्वार्थ; निष्पक्ष, तटस्थ; बेदाग़

चराग़ाँ = चराग़ों का जलना, पंक्तियों में बहुत से दीपक जलाने का कर्म; जलते हुए चराग़ों की पंक्तियाँ, दीपावली, दीपमाला, दीपोत्सव; बहुत से दीपक

रहगुज़र = रास्ता, पथ, मार्ग

चराग़ = दीप, दीपक, दिया, लैम्प; रौनक़, बनाव-सिंगार, रौशनी, उजाला


Sunday, 1 December 2024

अलविदा

 

बर्दाश्त कर लिया हमने  किसी तरह  उसे  खो देना

बर्दाश्त होता नहीं मगर किसी तरह  उसका न होना

 

वो गया भी तो कुछ इस तरह बिना पैग़ाम दफ़अतन1

ढूँढता रह गया मैं नाकाम किये न जाने कितने जतन

 

लोग हमदर्द न जाने कितने दिलासे दे चुके अब तक

और न जाने चलेगा ये तकल्लुफ़ी सिलसिला कब तक  

 

मैं आज जो  कुछ भी हूँ  बस उसी की  बदौलत हूँ

लोग कहते भी हैं कि मैं कुछ-कुछ उसी की सूरत हूँ


कोरी तसल्ली है कि जब तक का साथ था ख़ुशनुमा था

किसी को क्या ख़बर कि वो शख्स़ मेरा क़ुत्बनुमा2 था  

 

खो गया वक़्त की गर्दिशों में वो मेरे अज्दाद3 की तरह

रह गया ज़ेहन में मेरे ख़ुशफ़हम सी इक याद की तरह




1.दफ़अतन = अचानक, सहसा, यकायक, अकस्मात; फौरन ; बिना सोचे-समझे

2.क़ुत्बनुमा = दिशा बतानेवाला यंत्र, compass; (लाक्षणिक) नेतृत्व करने वाला, मार्गदर्शक, पथप्रदर्शक

3.अज्दाद = पूर्वज, पुरखे, बाप दादा, पुराने लोग



Sunday, 26 May 2024

वक़्त-ए-फुर्क़त


कुछ  दिनों  के  लिए  ही  सही  तुम  मुझसे  दूर  न  जाया  करो
और  मुमकिन  हो  तो  कभी  वक़्त  से  पहले  भी  लौट  आया करो

तुम्हारे  यहाँ  न  होने  से  ज़िन्दगी  यूँ तो बदस्तूर1 चलती रहती है 
पर  कुछ  कमी  सी  है  जो मुसलसल2 हर वक़्त  खलती  रहती है

मुश्किलें बस मजाज़ी3 ही नहीं  यहाँ कुछ  मस’अले4 रूहानी5 भी हैं
और कुछ कहानियाँ हैं जो तुम रूबरू6 बैठो  तो  तुम्हें सुनानी भी हैं

तुम्हारे  यहाँ   न होने से  पता नहीं क्यों  घड़ी बेतरतीब6  चलती है
नींद  कम  होती  है  सुब्ह जल्दी  होती  है  शाम  देर से  ढलती है

छुट्टियों  का दिन  तुम्हारे बिना  कुछ  और  भी  भारी  गुज़रता है
वक़्त-ए-फुर्क़त7  ज़हरीले  साँप  की  तरह रुक-रुक  कर सरकता है

अभी  तो  कुछ  ही  दिन  गुज़रे हैं  अभी इक लम्बा अर्सा8 बाक़ी है
दर्द   का   क़तरा9  गुज़र   गया   और   दर्द  का   दर्या10   बाक़ी है


1.     बदस्तूर = दस्तूर के अनुसार; यथावत

2.     मुसलसल = निरंतर, लगातार, सतत

3.     मजाज़ी = सांसारिक

4.     मस’अले = समस्याएँ

5.     रूहानी = रूह या आत्मा से सम्बंधित; दिली

6.     बेतरतीब = जो तरतीब में न हो; क्रमहीन; अनियमित; अस्त-व्यस्त

7.     वक़्त-ए-फुर्क़त = जुदाई का समय

8.     अर्सा = समय; अंतराल

9.     क़तरा = बूँद

10. दर्या = नदी

Sunday, 18 February 2024

अनबुझ सवाल


सफ़र ये क्या कहाँ मंज़िल किधर से आ रहे हैं हम
इन्हीं अनबुझ  सवालों में  उलझते  जा रहे हैं हम

मुलाक़ातें नहीं मंज़िल  बिछड़ना मरहला1 फिर क्यूँ
तसल्ली क्यूँ तकल्लुफ़2 से  नहीं अब पा रहे हैं हम

बिछड़ कर दोस्त  यूँ कोई किसी से मर नहीं जाता  
बिना तेरे  मगर फिर क्यूँ बिख़रते  जा रहे  हैं हम

नज़र भर देख तो लें हम मुख़ातिब3 किस बला से हैं
फ़ुसूँ4 है हुस्न उसका  या कि  धोखा खा रहे हैं हम

बड़ी मक़बूलियत5 दी  मौत ने  उस ज़िन्दगानी को
मरा जो  भूख से  अब क्यूँ उसे  घर ला रहे हैं हम

सुना है  मौत से पाबन्द  कोई शै6  नहीं  फिर क्यूँ   
गुज़रते  वक़्त से  आँखें  चुराते  जा रहे  हैं  हम


1. मरहला = पड़ाव
2. तकल्लुफ़ = तकलीफ़ उठाना; शिष्टाचार; दिखावटी तौर पर कोई काम करना
3. मुख़ातिब = सामने, बात करने वाला
4. फ़ुसूँ = जादू; फ़रेब
5. मक़बूलियत = लोकप्रियता
6. शै = चीज़, वस्तु, पदार्थ

 

 

 

 

 

 

 

Thursday, 11 January 2024

मुकम्मल ज़िन्दगी

आख़िर क्या होती है

एक मुकम्मल1 ज़िन्दगी ?

ये अजीब सा सवाल,

पता नहीं कहाँ से आ कर

ज़ेहन2 में एक बोझ

की तरह बैठ गया है.

उठते-बैठते हमेशा

ज़ेहन में इस पर एक

तक़रीर3 सी चलती रहती है.

 

कहीं ये वो ज़िन्दगी तो नहीं

जिसने बेशुमार4 दौलत कमाई हो,

ढेरों कामयाबियाँ हासिल की हों,

ता-उम्र सेहतमन्द रही हो,

और साथ ही दुख-दर्द से भी

बिलकुल नावाक़िफ़5 रही हो.

 

अब ज़ाहिर है कि ऐसी ज़िन्दगी तो

ख़्वाबों-ख़यालों में ही मिलेगी,

हक़ीक़तन6 तो ये मुमकिन नहीं लगती.   

 

तो फिर एक मुकम्मल ज़िन्दगी

कहीं वो ज़िन्दगी तो नहीं

जिसे जीने वाला

अपने आख़िरी लम्हों से थोड़ा पहले

चंद जानने वालों के दरमियान

ये ऐलान कर दे,

कि उसने एक मुकम्मल ज़िन्दगी जी है

और उसे अपनी ज़िन्दगी से

कोई भी गिला नहीं है.

 

और तो और,

अगर मौका मिले तो

ये क़िबला7 वही ज़िन्दगी

बिला शिक्वा8,

दोबारा जीने को भी तैयार हैं!

 

मगर क्या हम उनके क़ौल9 को

आँखें मूँद के सच मान सकते हैं!

अगर नहीं, तो क्या फिर

कोई ज़िन्दगी मुकम्मल नहीं,

और क्या, ये सिर्फ़

तसव्वुर बाँधने10 की बात है!

 

फ़ौरी11 तौर पर देखें

तो यही सच मालूम होता है,

क्योंकि बड़ी-बड़ी शख्सियतों तक ने भी

अपनी ज़िन्दगी में कुछ न कुछ

मलाल होने की बात क़ुबूल की है,

और बहुतों ने ये माना भी है

कि उनकी ज़िन्दगी मुकम्मल नहीं रही.

 

तो फिर ये कामयाबी,

ये दौलत, ये शोहरत,

अगर ये सब ज़िन्दगी को

मुकम्मल नहीं बना सकते

तो फिर आख़िर क्या है वो चीज़

जो इस ज़िन्दगी को

मुकम्मल बनाती है!

 

उस दरवेश12 ने मुस्कुराते हुए

मुझसे बस इतना ही कहा, कि

तुम्हारा ये सवाल ही ग़लत है!

ऐसी कोई चीज़ नहीं जो तुम्हारी

ज़िन्दगी को मुकम्मल बना सके,

चीज़ों की इतनी हैसियत कहाँ!

 

ज़िन्दगी का मुकम्मल होना,

किसी चीज़ या मुकाम के हासिल होने

या फिर किसी दर्द या तकलीफ़ के  

बस ना होने से ही नहीं होता,

और ना ही ज़िन्दगी,

अपने आख़िर में जा कर

मुकम्मल होती है.

 

 ज़िन्दगी तो हर रोज़ हर लम्हे

एक नया मौका पाती है

मुकम्मल होने का.

 

वो दिन, वो लम्हे, जो तुम्हें

सुकून और इत्मीनान पहुँचाते हैं,

जिनका गुज़रना,

तुम्हें मालूम तक नहीं पड़ता,

और जिन्हें तुम नहीं गुज़ार रहे होते    

किसी चीज़ की ख़ातिर,

या किसी और की ख़ातिर.

 

तुम्हें मालूम होता है

कि उस लम्हे में ज़िन्दगी

मुकम्मल गुज़री या नहीं !

 

एक दिन जब तुम बहुत बीमार थे, फिर भी  

तुमने किसी ज़रूरतमंद की मदद की थी

वो दिन, तुम्हारी जिस्मानी तकलीफ़ के बावजूद भी  

तुम्हें मालूम है कि मुकम्मल गुज़रा

 

दौलतमंद होने के बाद भी, जब-जब

तुमने अपनी ज़िन्दगी में कोई कमी

महसूस नहीं की, वो वक़्त,

तुम्हें मालूम है कि मुकम्मल गुज़रा

 

ऊँचे ओहदों पर पहुँच कर भी

जब कभी तुमने ख़ुद को

अपने साथियों से दूर नहीं पाया, वो हर लम्हा,  

तुम्हें मालूम है कि मुकम्मल गुज़रा

 

तुम्हारी किसी कामयाबी का जश्न

जब कभी भी तुम्हें अकेले

नहीं मनाना पड़ा, वो दिन,

तुम्हें मालूम है कि मुकम्मल गुज़रा

  

और इस तरह मेरे दोस्त

तुम ख़ुद देख सकते हो

कि कब, कहाँ और कैसे

तुम्हारी ज़िन्दगी मुकम्मल नहीं हो पाई !

वैसे याद रहे कि हर एक ज़िन्दगी

एक किस्से की तरह होती है

और कोई भी किस्सा

चाहे वो मुख़्तसर13 हो या तवील14,

ख़ुशनुमा हो या ग़मगीन,

मुकम्मल हो सकता है.

 

और रहा सवाल कि

आख़िर क्या है

एक मुकम्मल ज़िन्दगी !

 

तो बस यूँ समझ लो

कि एक सिलसिला है

मुकम्मल लम्हों और दिनों का,

एक ठहराव है आदमी की सोच में,

एक नज़रिया है ज़िन्दगी के बारे में,

कि फिर जिसके बाद

ज़िन्दगी मुहताज15 नहीं रहती

किसी ओहदे की, किसी मुकाम की,

किसी दौलत या शोहरत की,

और ना ही किसी कल की.

 

वो आज, इस लम्हे में ही

पूरी तरह मुकम्मल है,

और ऐसा होने से उसे

कोई नाकामयाबी,

कोई महरूमी16,

नहीं रोक सकती.

 

अगर तुम पैदा कर सको

ख़ुद में वो सोच,

वो ठहराव, वो नज़रिया,

तो मेरे दोस्त, हर रोज़

तुम अपने सामने खड़ा पाओगे

इक मुकम्मल ज़िन्दगी को.



1. मुकम्मल = संपूर्ण, भरपूर.

2. ज़ेहन = मन, बुद्धि.

3. तक़रीर = वक्तव्य, बात, बातचीत

4. बेशुमार = असंख्य, अनगिनत, जिनकी गिनती न हो सके, बहुत अधिक

5. नावाक़िफ़ = अनभिज्ञ, अपरिचित

6. हक़ीक़तन = वास्तव में; वस्तुतः; सच में; हकीकत में

7. क़िबला = बुज़ुर्ग या अज़ीज़ शख़्स के लिए, प्रतिष्ठित और सम्मानित व्यक्तियों के लिए संबोधन का शब्द

8. बिला शिक्वा = बिना शिकायत

9. क़ौल = कथन, वचन, बात; प्रतिज्ञा, वादा

10. तसव्वुर बाँधना = ख़्याल करना, सोचना, कल्पना करना

11. फ़ौरी = जल्दी

12. दरवेश = साधु; संन्यासी; फ़कीर; भिक्षुक

13. मुख़्तसर = लघु, कम, थोड़ा, संक्षिप्त, घटाया या छोटा किया हुआ, छोटा

14. तवील = दीर्घ, लंबा

15. मुहताज = दरिद्र, ज़रूरतमंद, इच्छुक, निर्धन, आश्रित, ज़रूरतमंद, अभाव वाला, जिस के पास कुछ न हो

16. महरूमी = निराशा, असफलता, नाकामी, वंचित रहना, अभाव


1.