Saturday, 15 March 2025

क़लम ख़ामोश है


क़लम  ख़ामोश है  बहुत  दिनों  से  कुछ लिखा  नहीं 
तुम्हारे   बाद   मुद्दआ   भी    कुछ   ऐसा   रहा   नहीं 

ये    कैसी    मेहर  वक़्त   की  तुम्हें   हम  भूलने  लगे 
सताए    याद   ना   यदा-कदा    यूँ   भी   हुआ   नहीं 

वही    इंसान  हर   तरफ़    वही   हंगाम   हर   तरफ़ 
तुम्हारे   बिन  लगे  है   यूँ  कहीं   कुछ  भी  नया नहीं 

मिले    कितने   ही   लोग   ख़ूबसूरत   राह   में  मगर 
तुम्हारे   बाद   दहर   में   कोई   तुम  सा  दिखा  नहीं 

गिराँ    हैं   ज़ेहन    पर    मेरे   अधूरे  क़र्ज़  की  तरह 
तुम्हारी  ख़्वाहिशें  जिन्हें   मुकम्मल  कर  सका  नहीं 

निगाहों   में   न   जुस्तुजू    रही    ना    इन्तिज़ार   ही 
हुआ बस यूँ कि दिल समझ गया अब कुछ बचा नहीं

शजर   बे-वक़्त   गिर  गया   मुझे   यूँ   बे-पनाह  कर 
किसी  बे-लौस  इश्क़  का  सहारा  फिर  मिला  नहीं  

उसी   की   रौशनी   से   थी   चराग़ाँ   रहगुज़र   मेरी 
गया  है   बुझ   चराग़   पर   अँधेरा   क्यूँ   हुआ  नहीं 





मुद्दआ = आशय, उद्देश्य, अभिप्राय, मंशा, स्वार्थ, प्रयोजन, दिल की इच्छा; वो चीज़ जिस पर दावा हो, जाएदाद; तात्पर्य, मतलब, अर्थ

मेहर = कृपा, दया, करुणा; स्नेह, प्रेम

यदा-कदा = जब तब, कभी कभी

हंगाम = वक़्त, ज़माना, मौसम; अफ़रातफ़री, हलचल, मजमा, भीड़

दहर = संसार, दुनिया

गिराँ = महंगा, अनमोल; कठिन; भारी, वज्नी; अरुचिकर, नापसंद, अप्रिय

ज़ेहन = मन, विचार की क्षमता, समझ, धारणाशक्ति; समझने-बूझने की शक्ति; याददाश्त

मुकम्मल = पूर्ण, पूरा; जिसमें ख़राबी न हो; शुद्ध; बिना घटाए बढ़ाए

जुस्तुजू = खोज, ढूंढ़ना, तलाश; खोई हुई वस्तु की तलाश करना, किसी चीज़ को प्राप्त करने के लिए किया गया प्रयास, आकांक्षा, इच्छा, जिज्ञासा

शजर = पेड़, वृक्ष

बे-लौस = निःस्वार्थ; निष्पक्ष, तटस्थ; बेदाग़

चराग़ाँ = चराग़ों का जलना, पंक्तियों में बहुत से दीपक जलाने का कर्म; जलते हुए चराग़ों की पंक्तियाँ, दीपावली, दीपमाला, दीपोत्सव; बहुत से दीपक

रहगुज़र = रास्ता, पथ, मार्ग

चराग़ = दीप, दीपक, दिया, लैम्प; रौनक़, बनाव-सिंगार, रौशनी, उजाला